90 का दशक तकनीक और सादगी के बीच आख़िरी संतुलन था. आज का मन सूचनाओं की भीड़ से थका हुआ है; तब हर चीज़ में जल्दबाज़ी नहीं, एक ठहराव था. शायद हमें वह दौर नहीं, बल्कि अपना खोया हुआ सुकून, सहजता और वह असली दुनिया याद आती है, जिसमें जीना कम और महसूस करना ज़्यादा था…🤍:)