जैसे-जैसे साँझ ढलती जाती है वैसे-वैसे मन भी उदासी की चादर ओढ़ता जाता है न जाने क्यों साँझ के उतरते ही सब कुछ इतना निस्तब्ध हो जाता है हृदय व्याकुल होकर किसी अनजाने उत्तर की खोज में भटकने लगता है मन किसी एक स्थान पर ठहरता ही नहीं विचारों की अनगिनत दिशाओं में भटकता रहता है।🌿