आज नींद में एक ऐसा सपना देखा, जो रूह तक काँप गई...
मैंने खुद को कफ़न और जनाजे से लिपटा हुआ देखा। चारों तरफ घरवाले और अपने बेसुध रो रहे थे, उनकी सिसकियों और बेबसी का शोर था—और मैं खामोश लेटा हुआ था।
लोग कहते हैं मौत से बड़ा कोई खौफ नहीं होता, पर उस मंज़र में मुझे डर नहीं बल्कि एक अजीब सा सुकून मिला। मैंने बिना किसी शिकवे के मुस्कुराकर अपनी मौत का इस्तकबाल किया।
पर अब आँखें खुली हैं तो दिल में एक अजीब सा सवाल चुभ रहा है— क्या वाकई लोग मौत से डरते हैं? या फिर... मैं अंदर से इस ज़िंदगी से इतना थक चुका हूँ कि अपनों की बेबसी और आंसुओं के बीच भी मुझे मौत में सुकून नजर आने लगा है?