कभी-कभी तर्क होते हुए भी बहस की ऊर्जा नहीं बचती है। ऐसा नहीं कि उत्तर नहीं है, बस हर बात सिद्ध करना व्यर्थ लगता है।
संजय बेलट्ठिपुत्त की तरह निष्कर्ष से विरत होना मेरा दर्शन सूत्र नहीं है, पर इतना जरूर समझ आता है जहां संवाद जिज्ञासा नहीं, जिद बन जाए, वहाँ मौन ही बेहतर उत्तर है।