#कांधो पर एक ज़िम्मेदारी#
वाह! क्या शौक़ हुआ करते थे
क्या लिखा करता था मैं!
अगर किताबों के वरक़ मिलते
तो आज क्या से क्या होता।
लेकिन अभी तो शेख़चिल्ली हूं बस
जिसे मिली थी झोपड़पट्टी
जिसे मिली थी ज़िम्मेदारी
जिसे मिली थी लानत - मलामत
जिसे मिली थी मज़दूरी
जिसपर थी गाली की बारिश
जिसपर थी मेहनत की बारिश
जिसपर थी भूख की बारिश
जिसपर थी तोहमत की बारिश
जो रात रात भर काम करता
दिन दिन भर खाना न खाता
शाम सवेरे सो न पाता
बचे वक़्त में सोचता रहता
कैसे किताबों के वरक़
बदल देते हैं जिंदगी?
कैसे शब्द सिखा देते हैं
बदले कैसे ज़िंदगी?
-Azoorey