गंगा के घाट पर...✨🪷
जब शाम ढले और सूरज कहीं खो जाए,
गंगा के पानी में सुनहरा रंग सो जाए,
घाट की सीढ़ियों पर चुपचाप बैठूँ मैं,
और दिनभर का शोर मुझसे दूर हो जाए।
न कोई भीड़ हो, न कोई आवाज़ हो,
बस बहती गंगा और ठंडी-सी हवा हो,
दूर किसी पेड़ पर चिड़ियों का बसेरा हो,
और सामने बस पानी का गहरा सवेरा हो।
घंटियों की धुन हो, पर शोर न हो,
दिल में कोई पुराना-सा ज़ोर न हो,
लहरें आती रहें, जाती रहें किनारे,
जैसे कहती हों-अब कुछ भी कमज़ोर न हो।
पाँव पानी में रखूँ तो ठंडक उतर जाए,
छूकर कोई लहर मन की थकान हर जाए,
जो बातें बरसों से दिल में दबी पड़ी हैं,
शायद उन्हें कहते-कहते आँख भर आए।
पूछूँ उन लहरों से अपने सारे सवाल,
क्यों कुछ रिश्ते बनकर रह जाते हैं मलाल,
क्यों कुछ सपने आँखों में पलते तो हैं,
पर क्यों हर सपने को नहीं मिलता मुकाम।
शायद गंगा कोई जवाब न दे पाए,
शायद मेरी बातों को बस बहा ले जाए,
पर उसकी खामोशी में कुछ ऐसा होगा,
कि मेरा बेचैन मन खुद ही शांत हो जाए।
फिर किसी कोने में एक दीप जलता मिले,
अँधेरी रात में जैसे कोई कल मिलता मिले,
लहरों पर काँपता हुआ वो छोटा-सा उजाला,
जैसे टूटे हुए मन को फिर से बल मिलता मिले।
न मुझे कुछ पाना हो, न कुछ खोना हो,
न बीते कल का कोई बोझ ढोना हो,
बस कुछ पल उस घाट के नाम कर दूँ,
जहाँ मुझे किसी और का नहीं—खुद का होना हो।
और जब लौटूँ उस घाट से शाम ढले,
शायद कुछ पुराने सवाल वहीं रह चले,
गंगा तो बहती रहेगी अपनी ही धुन में,
और मेरे भीतर भी कुछ नए रास्ते निकलें।
फिर भी कभी मन दुनिया से हार जाए,
और हर अपना भी थोड़ा पराया नज़र आए,
तो आँखें बंद करके बस इतना याद करूँ-
एक घाट है कहीं… जहाँ गंगा आज भी बहती जाए।🌊✨
~ Adya