तुम...
जानते हो मुझे क्या पसंद है?
शाम की हल्की ठंडक में
कुल्हड़ से उठती भाप और चाय,
आसमान की तन्हाई में चमकता हुआ
आधा-अधूरा सा चाँद,
कीचड़ से बेपरवाह खिलता कमल,
सफेद कागज़ पर जज़्बात उकेरती कलम,
पुरानी जिल्द वाली कोई महकती क़िताब,
और ख़ामोशी में सिसकती हुई कविता।
पसंद है वो गलियाँ
जहाँ की हवाओं में तुम्हारी खुशबू घुली हो,
यानी तुम्हारा शहर,
और वो चारदीवाल जहाँ सुकून की साँस मिले—मेरा घर।
ये सब पसंद हैं मुझे,
मगर इन सबसे बढ़कर,
और सबसे ज्यादा।
पहला शब्द फिरसे पढ़ो।।
अश्विन राठौड़ "स्वयम'भू"