प्रिय..मैंने तुम्हें चाहने की पराकाष्ठा को छू लिया है, किंतु तुम्हें अपना बनाने के लिए एक कदम भी न चल सका। वर्षों से केवल मैंने तुम्हें स्वप्नों में बुना है, तुम्हें सजते-संवरते देखा है, तुम्हारी जुल्फों के स्पर्श को महसूस किया है और तुम्हारी आँखों की अगाध गहराई को निहारा है। अपने कक्ष की एक खिड़की सदैव खोल कर रखी है, ताकि तुम्हारी सुगंध की हल्की सी आहट को भी अपने भीतर उतार सकूं।
तुम्हारी स्मृतियों ने मेरे मन मस्तिष्क पर इतनी गहरी छाप छोड़ी है कि मैं जीवन के मुख्य ध्येय और लक्ष्यों को विस्मृत कर बैठा हूँ। निजी जीवन अत्यंत कठिन दौर से गुजर रहा है। यहाँ तक कि अब जीवन यापन भी असाध्य प्रतीत होने लगा है। सुना था कि प्रेम सब कुछ संवार देता है, किंतु मेरे इस मोड़ पर मैं बिस्तर के एक कोने में सिमटा हुआ, अश्रुओं की सरगोशियों में निढाल पड़ा हूँ। कोई भी ईश्वरीय सत्ता इन बहते आंसुओं को रोक नहीं पा रही, या कदाचित वे स्वयं मुझे इस अत्यंत दुर्बल क्षण को जी लेने का साहस दे रहे हैं।
मैं अब स्वयं को तुम्हारी स्मृतियों की गिरफ्त से आजाद करना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि तुम्हें बेपनाह चाहते हुए भी, तुमसे अपना यह अदृश्य नाता तोड़ दूँ। इस एकतरफा प्रेम का बोझ न तो मुझे मृत्यु दे रहा है और न ही जीने की अनुमति। सोचता हूँ कि जीवन के जो कुछ पल मेरे हिस्से में शेष बचे हैं, उन्हें अब स्वयं को ही समर्पित कर दूँ।
यह तुम्हारी भावना के प्रति गद्दारी हो सकती है, किंतु यह मेरे भीतर का वह हौसला होगा कि मैंने तुम्हें चाहते हुए भी ऐसा कठोर निर्णय लिया है। एक ऐसा निर्णय, जिसमें तुम तो सदैव मेरी आत्मा में उपस्थित रहोगी, किंतु मैं तुम्हारे साए तक को नज़रअंदाज़ कर दूँगा। तुमसे किसी प्रेम या प्रतिदान की गुंजाइश कभी थी ही नहीं, क्योंकि मैंने कभी चाहा ही नहीं कि मैं भी तुम्हारी चाहत बनूँ।
मेरी साधना बस इतनी सी रही कि मैंने तुम्हें चाहा है, तुम्हें हर सांस में महसूस किया है और तुम्हारे प्रति सदैव निष्छल पवित्रता बनाए रखी। मेरे मन में तुम्हारे लिए कभी कोई दूषित विचार नहीं आया, मैंने तो बस सदैव तुम्हारी प्रसन्नता के लिए प्रार्थनाएँ की हैं और तुम्हारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए अनुष्ठान किए हैं।
किंतु अब, यही प्रेम मेरे स्वयं के अस्तित्व को ललकार रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो मेरा यह निस्वार्थ प्रेम स्वयं आत्म+हत्या करने को आतुर है। मैं इस गहरे मोह के चक्रव्यूह में फंसा हुआ हूँ... यदि कभी जाने-अनजाने मेरी आँखों से तुम्हारे लिए अश्रु छलक जाएँ, तो मुझे क्षमा कर देना।