सब अच्छा हो जाता है जब किन्नर आशीर्वाद देते हैं,
पर... क्या पैसों से आशीर्वाद मिलते हैं?
शादी, ब्याह, जन्म, आगमन... हर खुशी में उन्हें बुलाते हैं,
कुछ पैसे देते हैं, मिठाई देते हैं,
और आशीर्वाद देने को बहुत कहते हैं।
कामना होती है हमारी कि बस वो दुआ दे दें,
हम उनसे बार-बार यही कहते हैं—
"आशीर्वाद दो, सब अच्छा है... आप जब कह दो, सब सच्चा है!"
पर क्या सच में... पैसों से आशीर्वाद मिलता है?
उनके आने से लेकर उनके जाने तक, वो तो बस दुआएं ही देते हैं,
पर क्या इतने कुछ पलों में कोई आशीर्वाद मिलता है?
उनके जाने के बाद... पीठ पीछे लोग जाने कितनी बड़बड़ाहट करते हैं,
क्या नफ़रत की उस ज़मीन पर कोई आशीर्वाद पलता है?
खुदसे इज़्ज़त नहीं धेले की... और हम उनको इज़्ज़त देने की बात करते हैं,
क्या ऐसे खोखले इरादों से आशीर्वाद चलते हैं?
आशीर्वाद तो सम्मान से मिलता है, जो वो अपनी मर्ज़ी से दें,
और हम... पैसों से उनका आशीर्वाद खरीदते हैं!
क्या सच में वो आशीर्वाद होते हैं?
मुझे समझ नहीं आता, लोग ऐसा कैसे करते हैं?
सम्मान नहीं देते, इज़्ज़त नहीं करते,
पर अपने लिए सब कुछ अच्छा चाहते हैं!
लोग ऐसा दिखावे का आशीर्वाद... कैसे सहन कर पाते हैं?