अलमारी
अलमारी में आज भी किताबें रखी हैं।
वही किताबें,
जिन्हें मैं तुम्हारे साथ पढ़ना चाहती थी।
मैं चाहती थी, तुम आओ
और देखो—
कुछ किताबों के पन्नों में
आज भी वो निशान है,
जहाँ मैं तुम्हारे साथ रुक जाना चाहती थी।
अब उन किताबों पर
धूल जमने लगी है।
धूल शायद किताबों पर नहीं जमती,
कुछ इंतज़ारों में भी जम जाती है।
कभी-कभी लगता है निकाल दूँ
ये सारी किताबें
और झाड़ दूँ ये धूल।
मगर drti हूँ।
सफ़ाई करते-करते वो वक़्त न गिर जाए,
जो मैंने संभाल रखा है
इतने सालों से किसी किताब में।
इसलिए रहने देती हूँ
किताब को भी,
धूल को भी,
और शायद तुम्हें भी।