एकांत मेरी विवशता नहीं, मेरी प्रकृति का स्वभाव है।
मुझे प्रिय है मौन, और स्वयं में लीन रहना।
किंतु यदि मैं प्रतिदिन आकर ठहरता हूँ तुम्हारे समीप, और त्यागता हूँ अपनी उस प्रिय एकांतता को, तो बोध करना, तुम मात्र एक संज्ञा नहीं, वो विराम हो जहाँ मेरा एकांत भी सहर्ष पराजित होता है।
यदि मेरा मौन तुम्हें पुकारता है, तो यकीनन, तुम मेरी चेतना में अत्यंत विशिष्ट हो।