सच में हुआ क्या? मुझे नहीं पता...
मैं चल रही थी, मैं शांत थी, मैं खुश थी।
फिर कुछ तो हुआ... और मैं रुक गई।
मुझे नहीं पता क्या हुआ, पर मैं रुक गई।
और फिर देखा... ठहरना है,
ठहरी, तो जाना कि थमना है,
और थमकर... मैं वहीं बैठ गई।
बैठके मैंने सबकी सुनी,
और फिर मैने कुछ अपनी भी कह दी,
फिर उसके बाद जो हुआ...
मुझे नहीं समझ आया कि वो क्या हुआ!
एक-एक करके सब अपनी कहने लगे,
मैंने जो कहा था... वो तो महज़ एक शब्द था,
पर नाजाने क्यों उस पर टिप्पणी पर टिप्पणी, सब वाक्यों में करने लगे?!!!
उन वाक्यों को सुनते-सुनते... मैं सहम गई।
मेरा एक आँसू आँख पर आया,
पर वो गिरने से पहले रुक गया।
दूसरे के आने पर, पहले ने पूछ लिया—
"आना है, या रुक जाएँ?"
पर पहले के पूछने में थोड़ा अहसास था... तो दूसरा गिर गया!
दूसरे के गिरने को, पहले ने इजाज़त में 'हाँ' समझा,
फिर क्या... उसके बाद दोनों का साथ बन गया!
मैं इतनी ख़ामोशी में थी, फिर भी यह हुआ...
और सच कहूँ... सब मेरी मौजूदगी में था,
लेकिन मुझे आज भी नहीं पता कि क्या हुआ!
कितना अजीब है ना...।।।।।।