मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में, ख़्यालों की एक अलग ही दुनिया बसती है,
मैं जीती तो हूँ हकीकत में... पर मेरी सांसें उसी दुनिया में चलती हैं!
मुझे जीना पसंद है, तो मैं जीती हूँ,
मुझे हंसना पसंद है, तो मैं हंसती हूँ...
पर जब मन करे रोने का, तो मैं रोने से पहले...
पता नहीं क्यों, थोड़ा सोचती हूँ!
थोड़ा अजीब है मेरा मुझसे मिलना,
पर जब भी मिलती हूँ, खुलकर मिलती हूँ!
कभी सब खाली सा लगता है, तो कभी बहुत भारीपन,
पर जो भी हो... मुझे उसमें ही अच्छा लगता है।
यह जैसी भी दुनिया है, मैं इसमें खुलकर जीती हूँ!
मुझे अच्छा लगता है चलना, तो मैं चलती हूँ,
नहीं रुकती, नहीं ठहरती...
गिर जाती हूँ कभी, तो हंसकर संभलती हूँ!
मेरे ख़्यालों की दुनिया में, मैं खुश हूँ,
और मैं उस खुशी के साथ ही खुद को समझती हूँ...
क्योंकि... मैं मुझे वैसी ही अच्छी लगती हूँ!