रात की चांदनी हैरान है
कैसा ये व्यस्त इंसान है
तारो ने पूछा हंसकर ये
ऐ चांद आज क्यों अनजान है
लगे आज सारा जग परेशान है
इतना सुंदर है आसमान
झिलमिलाते तारे दीपमान है
नजर उठाकर देखे कोई तो
पलके बिछाए बैठा जहान है
चांद ने पूछा मानव से जब
क्यों दौड़ रहे बेचैन हो सब
एक पल ठहर कर देखो
मेरी चांदनी तारो संग वीरान है
क्यों हंसना भूल गए सब
जाने खुद से ही रूठ गए सब
रुककर बोला मानव तब
ऐ चांद ना है तेरी खता
एक मृग तृष्णा है ये जग
कौन सी दौड़ है ये, नहीं पता
यहां अपने भी सब
एक-दूजे से अनजान है