उंगली थामकर चलना सिखाया,
हर मुश्किल में हँसना सिखाया।
अपनी खुशियों को पीछे रखकर,
मेरे सपनों को आसमाँ दिखाया।
दिन-रात पसीने की बूंदों से,
जिन्होंने मेरी तक़दीर सजाई है,
अपनी जेब खाली रखकर भी,
मेरी हर ख़्वाहिश पूरी कराई है।
कभी कड़क धूप, तो कभी छाँव हैं,
मेरे रुकते हुए सफ़र का वो पाँव हैं।
बाहर से भले कठोर दिखें,
पर अंदर से ममत्व का गाँव हैं।
पापा, आपका साया ही मेरी ढाल है,
आपके होने से ही मेरा हर कल निहाल है।
आपको शब्दों में बयाँ करना आसान नहीं,
आप ही मेरी पहचान, आप ही मेरा अभिमान हैं।
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