बारह बजे का भूत
बारह बजे रात को, आवाज आई भारी,
“ही… ही… ही…” सुनकर काँपी दुनिया सारी।
शर्मा जी बोले, “घर में भूत है आया!”
रमा बोली, “पहले अपना डर भगाया!” 😄
टॉर्च लेकर निकले जनाब बड़े शेर,
दो कदम चलते ही काँप गए पैर।
स्टोररूम खोला—अंदर कुछ नहीं,
फिर भी आवाज आई—“ही… ही… ही…!”
पड़ोसी बोले, “मामला बड़ा गंभीर है,”
तांत्रिक बोला, “आत्मा बड़ी वीर है!”
शर्मा जी बोले, “कितने पैसे लेगा?”
तांत्रिक बोला, “पहले भूत तो भागेगा!”
फिर मिला एक पुराना मोबाइल,
जिसमें था डरावना रिकॉर्ड कमाल।
रोहन बोला, “पापा, मजाक था मेरा,”
शर्मा जी बोले, “बेटा, तू तो निकला लुटेरा!” 😂
लेकिन तभी फिर आवाज आई,
“ही… ही… ही…” और सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हुई भाई!
संदूक हटाया, राज खुल गया,
वर्मा जी का स्पीकर वहाँ मिल गया।
भूत नहीं था, शरारत थी सारी,
डर के पीछे छिपी थी हँसी प्यारी।
शर्मा जी बोले, “अब मेरी भी सुन लो बात—
हर रात बारह बजे होगी भूतों की मुलाकात!”
डर भी हँसा और हँसी भी आई,
शरारत ने मोहल्ले में धूम मचाई।
सीख यही है इस कहानी की खास—
डर को हँसी में बदल दो, जिंदगी होगी झकास! 😄