विकल्पों की उपलब्धता हमें भ्रमित करती है,मानसिक रूपसे दुर्बल भी! हमें विकल्पों का निरयन करके उन्हें संकीर्ण करते रहना चाहिये! विकल्पों के आधिक्य से भी कभी तो मन सीमितता से ग्रसित हो जाता है एवं उपलब्ध विकल्प सीमित प्रतीत होते हैं एवं विकल्पों के न्यून होने से वो सीमितता नहीं आती!