मनुष्य...अक्सर उन्हीं चीज़ों का सबसे अधिक विरोध करता है, जिन्हें उसने स्वयं कभी जिया ही नहीं होता।जिसने दुनिया की सैर की हो, वह घूमने को आवारगी नहीं कहेगा।जिसने प्रेम को सच में जिया हो, वह किसी को प्रेम करने से नहीं रोकेगा।समस्या कर्मों में कम होती है, समस्या उन अधूरे अनुभवों में होती है, जो जीवन को जाने बिना ही उसके बारे में निर्णय सुना देते हैं।मनुष्य प्रायः उसी को गलत ठहराता है, जिसे वह स्वयं कभी समझ या जी नहीं पाया।कई बार विरोध नैतिकता से नहीं, बल्कि अधूरेपन, भय और सीमित अनुभवों से जन्म लेता है।