बेटी की आत्मनिर्भरता
खुद के पैरों पर खड़े होना,
अब कोई शौक नहीं, मजबूरी है।
बदलते दौर में हर लड़की का,
अपना पैसा कमाना जरूरी है।
दूसरों की मुट्ठी पर कब तक,
अपनी खुशियों को तौलेगी?
कब तक छोटी-सी चाहत पर,
वो नजरें झुकाकर बोलेगी?
मां-बाप के सिर का बोझ नहीं,
उनका सहारा बनना है।
किसी के अहसानों पर नहीं,
स्वाभिमान से आगे बढ़ना है।
पति, पिता या भाई का,
साथ तो हमेशा प्यारा है।
पर अपने हक का एक तिनका,
खुद की पहचान का सहारा है।
मुसीबत जब भी चौखट पर आए,
वो बेबस होकर न रोए।
अपनी हिम्मत के दम पर वो,
अपनी पहचान कभी न खोए।
पैसा सिर्फ कागज़ नहीं,
उसकी आज़ादी का पैमाना है।
आत्मनिर्भर बनकर ही अब,
उसे नया इतिहास बनाना है।
अगर यह कविता आपके दिल को छू गई हो और आप भी बेटियों की आत्मनिर्भरता का समर्थन करते हैं, तो कमेंट में 'स्वाभिमानी बेटी' ज़रूर लिखें और अपनी राय शेयर करें।
ऐसी ही और दिल को छू लेने वाली व प्रेरणादायक रचनाओं के लिए Nisha Choudhary (@nisha21) को अभी Follow करें!