जिंदगी से कोई राब्ता भी न था
जो साँस मैं ले रहा था उनसेें ठीक से वास्ता भी न था
सिवा तेरे कोई तलब थी भी नहीं
सिवा तेरे में कुछ माँगता भी न था
हाथ छोड़ गये अपने मेरे
जो हाथ पकड़े खड़े हैं उन्हें पहचानता भी न था
जानता हूँ मैं इरादों को तेरे
खंजर पकड़े खड़े हो दिल कांपता भी न था
मेरी हसरत तेरे सिवा कुछ नहीं
बाकी हसरतों में जानता भी न था
दीवारों पे सजी मेरे खूँ की कसम
मेरे कातिल कीे रिहाई के सिवा कुछ माँगता भी न था