जेंडर का कोई लेना देना नहीं इस बात से कि जहां बहुत ज़्यादा आपकी अपेक्षा होती है कि जैसा मैं चाहूँ वैसा हो और नहीं होता तो पुरुष हो या स्त्री, अंदर से भाव मरने लगते हैं। जितनी तीव्रता ज़्यादा होती है महसूस करने की, उतना ही ज़्यादा खालीपन लगता है और एक दिन एक दम शून्य हो जाता इंसान