कर्ण विरोधाभासों का सबसे मौन अध्याय हैं।
जिसने जीवन भर दान देकर अपने हाथों को कभी रिक्त नहीं होने दिया, उसी के हिस्से में पहचान की ऐसी दरिद्रता आई कि मृत्युशय्या पर भी उसे अपने जन्म का परिचय माँगना पड़ा।
वह कवच-कुंडल देकर भी महादानी कहलाया,
मगर जिसे समाज ने जन्म से ही अपना नहीं माना,
उसके पास अंत तक देने को केवल अपना अस्तित्व बचा था।