न महलों का विछोह था न काँटों का डर बस एक हाथ था जिसने हर कष्ट को तृण समान कर दिया।
जब राम ने वन को स्वीकार किया, तो सीता ने राम को संसार मान लिया। पत्तों की कुटिया में जब संध्या ढलती, तो संसार की सबसे बड़ी महारानी ज़मीन पर बैठ केवल राम को निहार कर तृप्त हो जाती। न कोई विलाप, न
कोई अभाव जहाँ राम की उपस्थिति ही सारा वैभव थी।
सच्चा प्रेम परिस्थितियों से नहीं, उस भरोसे से आँका जाता है जहाँ वनवास भी तीर्थ बन जाए।