एक समय बाद...न आपको प्रेम में खुद को साबित करने का शौक रहेगा, न जबरदस्ती अधिकार जताने का जूनून, और न ही हर मोड़ पर अपने समर्पण का अहसास कराने की चाह क्योंकि-प्रेम की परिपक्वता इंसान को यह सिखा देती है कि....प्रेम बांधने में नहीं, आज़ाद कर देने में है; हर शिकायत को एक मुस्कान में समेटना और "ठीक है" बोलकर उसकी ख़ुशी चुन लेना ही सच्चा प्रेम और आत्म-सम्मान है।