मैं और मेरे अह्सास
रिमझिम
रिमझिम बारिश की बूंदें बहका रही हैं l
धीरे धीरे मन का मयूर चहका रही हैं ll
मिट्टी की सौगी खुशबु से चारो ओर l
बहकती फ़िज़ाओं को महका रही हैं ll
झम-झम-झम-झम पानी बरसे ओ l
जल के बादलो को लहका रही हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह