जब द्रौपदी ने कृष्ण की उँगली पर बाँधा अपने आँचल का टुकड़ा…
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रक्षाबंधन की कथाओं में कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग सबसे भावुक कथाओं में से एक माना जाता है। यह कथा हमें बताती है कि रिश्ते हमेशा रक्त के नहीं होते, कभी-कभी एक छोटा-सा स्नेह भी जीवनभर का बंधन बन जाता है।
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कहा जाता है कि एक अवसर पर श्रीकृष्ण की उँगली पर चोट लग गई और उससे रक्त बहने लगा। द्रौपदी ने जब यह देखा तो उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़ा और कृष्ण की घायल उँगली पर बाँध दिया।
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वह कोई विधि-विधान से बाँधी गई राखी नहीं थी।
न कोई मंत्र था, न कोई औपचारिकता।
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बस एक अपने की चोट देखकर दूसरे के हृदय से निकला स्नेह और अपनापन था।
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कृष्ण ने द्रौपदी के उस छोटे-से त्याग को साधारण नहीं समझा। कहते हैं, उन्होंने उस कपड़े के टुकड़े को अपने ऊपर चढ़े एक प्रेम के ऋण की तरह स्वीकार किया।
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समय बीता…
और फिर वह दिन आया जब हस्तिनापुर की सभा में द्रौपदी की मर्यादा संकट में पड़ गई। सभा में उपस्थित बड़े-बड़े योद्धा और बुजुर्ग मौन खड़े रहे, लेकिन द्रौपदी ने अंततः अपने सारे सहारे छोड़कर श्रीकृष्ण को पुकारा।
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और तब वही कृष्ण, जिनकी उँगली पर कभी द्रौपदी ने अपने आँचल का एक छोटा-सा टुकड़ा बाँधा था, उसकी लाज के रक्षक बनकर खड़े हुए।
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लोकपरंपरा इसी प्रसंग को द्रौपदी और कृष्ण के उस पवित्र बंधन से जोड़ती है, जिसे आगे चलकर रक्षाबंधन के भाव से देखा गया।
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क्योंकि द्रौपदी ने कृष्ण को कुछ माँगकर नहीं बाँधा था..
उसने तो बस उनकी चोट पर अपना आँचल रख दिया था।
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और शायद सच्चे रिश्तों की खूबसूरती भी यही है...
जहाँ दिया हुआ प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता,
वह किसी न किसी रूप में लौटकर जरूर आता है। ❤️
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नोट: कृष्ण की उँगली पर द्रौपदी द्वारा साड़ी का टुकड़ा बाँधने की कथा लोकप्रिय पौराणिक/लोकपरंपरा में रक्षाबंधन से जोड़ी जाती है; इसे महाभारत के मूल ग्रंथ में वर्णित रक्षाबंधन संस्कार के रूप में नहीं प्रस्तुत करना चाहिए।
- Hemant Parmar