ख्वाहिशों के परिंदे, उनसे कहें क्या,
पंख फैला के बस बहने दो उन्हें।
रास्ते हैं अनजाने, मंज़िल अभी दूर है,
धड़कनों की यह धुन सुनने दो उन्हें।
कहीं ग़म की धूप है, कहीं छांव है,
हर मोड़ पर बसा एक नया गांव है।
वक़्त की रवानगी में बहना ही तो ज़िंदगी है,
गिर कर फिर संभलने में ही तो हर ख़ुशी है।
खोल दो सभी दरवाज़े अपने दिल के,
हर लम्हे को जी लो मुस्कुरा के मिल के।
रात चाहे कितनी भी काली क्यों न हो,
उजाला ज़रूर आएगा सुबह बनके।