कभी-कभी कोई बेवजह की बात ज़ेहन में आकर वहीं अटक जाती है फिर लाख कोशिश करो,वह निकलती नहीं जब तक उसे किसी से कह न दो,लिख न दो या फिर कर न दो,मन के किसी कोने में वैसी ही पड़ी रहती है बिल्कुल वैसे ही,जैसे हम किसी चीज़ को कहीं छिपाकर रख देते हैं यह सोचकर कि उसे भूल जाएंगे,लेकिन भूल नहीं पाते शायद मन भी चीज़ों को भूलता नहीं,बस उन्हें कहीं भीतर छिपाकर रख देता है...!