जब हम अपने अस्तित्व को दूसरों की नजरों, प्रशंसा और पहचान से जोड़ लेते है, तब धीरे-धीरे हमारे भीतर अहंकार जन्म लेने लगता है। हमे हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होती है, अपनी श्रेष्ठता दिखानी होती है और यह अपेक्षा रहती है कि लोग मेरे बारे में सोचें, मेरी बातें करें और मुझे महत्व दें। लेकिन यह चाह कभी पूरी नहीं होती, क्योंकि जितनी पहचान मिलती है, उतनी ही अधिक पहचान पाने की भूख और बढ़ती जाती है।
अहंकार व्यक्ति को भीतर से कमजोर करता है, रिश्तों में दूरी लाता है और मन की शांति छीन लेता है। सच्ची महानता इस बात में नहीं कि दुनिया हमें कितना जानती है, बल्कि इसमें है कि हमारे कर्म कितने सच्चे हैं और हमारे जाने के बाद भी हमारी अच्छाई कितनी देर तक लोगों के दिलों में जीवित रहती है।