मैं अपनों के लिए थोड़ा ज्यादा भावुक हूँ।
अपना होने के लिए खून का रिश्ता जरूरी नहीं… कुछ लोग बिना किसी रिश्ते के भी दिल में बहुत गहरे उतर जाते हैं। रोज बात हो, यह भी जरूरी नहीं, उनका ख्याल फिर भी भीतर कहीं बना रहता है।
अपनत्व मेरे लिए किसी रिश्ते का नाम नहीं, बल्कि वह एहसास है जिसमें किसी के सुख में मन अपने आप खिल उठे और उसके दुख में भीतर कुछ टूटने लगे। जहाँ औपचारिकताएँ खत्म हो जाती हैं और बिना कहे भी ए
एक दूसरे की चिंता समझ में आने लगती है। शायद इसी को अपना होना कहते हैं जब किसी की जिंदगी में हमारी मौजूदगी जरूरी न हो, फिर भी उसकी तकलीफ हमें चैन से बैठने न दे।
मेरे किसी अपने पर कोई मुसीबत आए, तो उसकी परेशानी मुझे अपनी लगती है। उसकी पीड़ा को देखकर मन भीतर तक बेचैन हो जाता है। चाहकर भी खुद को उससे अलग नहीं कर पाता। बस यही मन करता है कि उसकी तकलीफ का थोड़ा सा हिस्सा मैं अपने हिस्से ले लूँ, उसकी मुश्किल में उसके साथ खड़ा रहूँ और उसे कभी अकेला महसूस न होने दूँ।
मेरे ऐसे अपने बहुत कम हैं, गिने-चुने…
लेकिन शायद इसी वजह से उनकी खुशी मुझे सुकून देती है और उनकी तकलीफ भीतर तक तोड़ देती है।
कुछ लोग जिंदगी में कम होते हैं, मगर उनके लिए दिल में जगह पूरी दुनिया जितनी होती है।