मैं और मेरे अह्सास
तमाशा
तमाशा होने से जिंदगी दुश्वार हो जाती हैं l
तमाशा देखनेआलों की भरमार हो जाती हैं ll
अपनों तक सीमित रहे तब तो ठीक बात है l
मसले ज़ाहिर हो जाने से बेकार हो जाती हैं ll
मसले भीतर ही भीतर सुलझा लेने चाहिए l
सभी सलाहकार तक इसरार हो जाती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह