स्त्री
स्त्री...
कहने को शब्द है छोटा सा,
पर उसके रूप हैं अनेक।
कभी बेटी,
कभी बहन,
कभी पत्नी,
तो कभी माँ बनकर
हर रिश्ता संवारती है।
पर मन में एक प्रश्न उठता है—
क्या उसकी अपनी भी कोई पहचान है?
जो किसी रिश्ते की मोहताज न हो,
जो सिर्फ़ उसी के नाम से जानी जाए।
क्या वह इतनी कमज़ोर है
कि हर बार किसी और के नाम से पुकारी जाए?
या फिर समाज ने ही
उसकी पहचान को रिश्तों में बाँध दिया है?
काश...
एक दिन ऐसा भी आए,
जब उसे किसी का परिचय न देना पड़े,
और दुनिया कहे—
"यह वही है, जो अपनी पहचान ख़ुद है।"
— दीपांशी गर्ग ✍️