"बेटी की चीख"
हर रोज़ अख़बार में एक नई ख़बर आती है,
इंसानियत फिर शर्म से नज़रें झुकाती है।
दरिंदों की सोच को अब जड़ से मिटाना होगा,
हर बेटी को बेख़ौफ़ जीने का हक़ दिलाना होगा।
कपड़ों से नहीं, नज़र से चरित्र पहचाना जाए,
औरत नहीं, दरिंदों की सोच को कटघरे में लाया जाए।
जब तक अपराधी को सज़ा का डर नहीं होगा,
तब तक समाज सच में सुरक्षित नहीं होगा।
एक संदेश:
"बेटियों को सीमाएँ नहीं, सुरक्षा और सम्मान चाहिए। चुप्पी नहीं, न्याय चाहिए।"