मैं और मेरे अह्सास
याद
यादों के सहारे में ख़ुद को लपेटा हैं l
तिनका तिनका जिंदगी को समेटा हैं ll
तस्वीर बनाई मिट्टी के ढेर पर ओ l
कभी कभी अकेलेपन को सहेजा हैं ll
बारिस की बौछार पर नाम लिखा l
इल्ज़ाम न लगा नाज़ुक कलेजा हैं l
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह