"…होड़दार..."
और फिर तू छूट जायेंगी
इन्हीं गलियों से
आहिस्ता से फूलों सजी हुई कार
निकल पड़ेंगी
वेखूगा तुझे भीड़ के बीच खड़े-खड़े
न तब सिर्फ वेखने के सिवा कोई काम बचेगा।
और फिर तू छूट जाएंगी
होगे यार के कूचे खाली
गालियां दी सड़के उदास।
पता भी तो बदल जाएगा तेरा
फोन नंबर नहीं चलेगा जो मैंने
तुझे दिया था
तू नहीं होगी तब जलता सूरज
मुझे देगा खबर की आज वे फिर
एक बार धूप में चले थे,
चंदा अपनी नरम शीतलता
बिछाएंगा वहां भी जहां कभी
तुम्हारे कदम नदी की तरह मूड जायेंगे।
और फिर तू छूट जाएंगी
बालों में उंगलियां फेरते हुए
जब भी आयेंगी याद मेरी
उन क्षणों में
देखना तुम हवा में बसी सांसे मेरी
पहुंचे जाएंगी तुम तक
तुम्हारे लिया तुम्हारा हाथ थाम लूंगा मैं,
न जाने कितनी बातें करूंगा तुम से
तुम्हारी बातें जो कभी कर न पाए
गलियारे में खड़े रहकर।
देखा था सपना की
अपनी ही गली में रस्ते पर खड़े
देखूंगा तुम्हें मेरे घर की गैलरी में तुम्हें बाल सुखाते हुए,
बारिश होते हुए।
सोचा न था कि इस कदर
तू छूट जाएंगी
सजी हुई कार में तुम्हारा मृतदेह मैं देखूंगा भीड़ में खड़े रहते हुए।
इसी छूट जाने से मुझे अब ईर्ष्या हो रही है
यह जो छूटना है वह हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा
साथ रहेगा मेरा होड़दार बनकर।