मन का माया-जाल
कुछ समझता नहीं मन मेरा,
बस उलझनों में खोया है।
हर दिशा में माया का जाल,
जाने किसने बोया है।
जब भी एक कदम बढ़ाती हूँ,
राह नई रुक जाती है।
सपनों की उजली किरणें भी,
बादल बन छिप जाती हैं।
चारों ओर आकर्षण इतने,
सत्य कहीं दिखता नहीं।
मन अपने ही प्रश्नों में उलझा,
उत्तर कोई मिलता नहीं।
फिर भी आशा का दीप लिए,
मैं आगे बढ़ती जाती हूँ।
माया के इस घने वन में,
सत्य की राह खोजती हूँ।
एक दिन यह धुंध छंटेगी,
मन निर्मल हो जाएगा।
माया का सारा बंधन टूटे,
अंतर प्रकाश