अंतिम सत्य*
जन्म के समय ही लिख जाती निधि
कितनी है साँसे और कब है गति
जिंदगी भर इंसान दौड़ता माया के पीछे
और अंत में खाली हाथ ही जाता है
मोह माया, धन दौलत सब यहीं रह जाती
बस कर्म ही है साथ जाता है
जानते हैं सब यह अंतिम सत्य
फिर क्यूँ ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा जैसे कृत्य
मंजिल कभी सुन्दर नहीं होती, क्यूँ
क्योंकि ये तो ठहराव है, भ्रम है
रास्ते ही सुन्दर होते हैं क्यूँ
क्योंकि उनमें संघर्ष की गाथा है
फिर क्यों इतराता है इंसान
ये शरीर भी तो एक दिन राख हो जाना है
बने किसी का सहारा वो जिंदगी है
कोई मुस्काये तुम्हारी वजह से वो जिंदगी है
मौत है अंतिम मंजिल
वहाँ तक पहुँचने का सफर जिंदगी है।
*वन्दना शर्मा*
*12/6/26*