Hindi Quote in Poem by Chandervidya urf Rinki

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दम तोड़ती साँसें

कवियित्री: चंद्रविद्या उर्फ़ रिंकी

मुझे लगता है
मेरे मन की आत्मा
कुछ सीमित दीवारों के फंदे में फँसी
दम तोड़ रही है।

एक घुटती साँस,
और ऐसा लगता है कभी-कभी
मानो दमघोंटू हवा
गले और हृदय के चारों ओर
फैल चुकी हो।

एक सुई,
जो दिख नहीं रही,
मगर रह-रहकर
मन में भर देती है चुभन।

न कोई घाव दिखता है,
न कोई रक्त बहता है,
फिर भी पीड़ा है
जो भीतर कहीं
चुपचाप जीवित है।

कभी लगता है
मैं पुकार रही हूँ,
पर मेरी आवाज़
उन्हीं दीवारों से टकराकर
लौट आती है।

और मैं
उसी घुटन,
उसी चुभन,
उसी मौन के साथ
जीती चली जाती हूँ।

बस इतना जानती हूँ
मेरे भीतर कुछ है
जो धीरे-धीरे
दम तोड़ रहा है।

Hindi Poem by Chandervidya urf Rinki : 112027026
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