मैं थकती नहीं बोलने से,
वो शांत एक समंदर सा।
मैं चलती हूँ अपनी धुन में,
वो ठहरा हुआ एक मंज़र सा।
उसे आती नहीं चालाकियाँ,
मैं उससे थोड़ी तेज़ हूँ।
वो सुलझा और समझदार बड़ा,
मैं बिखरी सी रेत हूँ।
मैं हँसती हूँ बेपरवाह सी,
वो मुस्कान संभाल के रखता है।
मैं लफ्ज़ों में खो जाती हूँ,
वो खामोशी में सब कहता है।
हैं दोनों अलग किनारे फिर भी,
दिल एक दूजे से जुड़ा रहता है।
मुझे जीतनी है दुनिया सारी,
वो मुझको दुनिया कहता है।