## **ग़ज़ल**
दिल के शहर में फिर तेरी आवाज़ उतर आई,
सूनी सी इन राहों में इक याद ठहर आई।
हमने तो छुपा रखे थे दर्द पुराने सारे,
तेरी एक मुस्कान थी, और आँख भर आई।
रातों की तन्हाई में हम खुद से लड़ते रहे,
फिर तेरी मोहब्बत की खुशबू नज़र आई।
टूटे हुए ख़्वाबों को सीने से लगाए हम,
हर मोड़ पे किस्मत भी हमसे बिछड़ आई।
अब कौन समझ पाए इस दिल की ख़ामोशी,
जब बात तेरी निकली, ग़ज़ल खुद बिखर आई।