सूटकेश से एक एक कपड़ा निकालती जा रही थी।
टप टप आँखो से आंसू बरस रहे थे। मन बार-बार चुप हो कर रो रहा था। मुझे समझ कोई नही रहा था। क्यो कि मैं एक साल से लगातार घर मे कैद अपने मायको जो जा रही थी। सोच रही थी।ये साड़ी मार्केट पहन जाऊंगी सारे दिन काम मे व्यस्त रहती हूँ। थोडा ढंग से सज संवर तैयार हो कर अपने मन को तरोताज करूंगी। ये सूट अपनी भाभियो से मिलने जाऊंगी । मैचिंग चूडी बिन्दी भी रख लेती हूं। कोई कमी न रह जाये शॉक मे मेरी बचपन की सखी सहेली मिलेगी गप शप मारेंगे ' पार्क मन्दिर भी घूमेंगे । स्टोरेन्ट मे टी पार्टी करेंगे। सारा सूट केश खाली कर रही थी। बच्चे - मम्मी चलो न गर्मी की छुट्टी मे ज्यादा छुट्टी इसी मई जून में ही तो मिलती है।
माँ- बेटा फिर देखा जायेगा। ऐसे ससुराल मे लड कर मायके नही जाया करते है। बच्चे - पर लड़ाई आपने कहाँ करी है। बल्कि दादी पापा ही लड़ रहे हैं। दादी को बहाना चाहिय घर से बाहर न जाने का वो बीमार नहीं है। काम न करने का बहाना है। कब तक दबती रहोगी ' बहु हो गुलाम नही।
मॉ कोई बात नही शादी के बीस साल निकाल दिये। ये दिन भी निकल जायेंगे । फिर मैं वही ससुराल की रोजमर्य की जिन्दगी मे यम जाती हूं। औरत जात को आराम कहाँ। कही भाड़ मे सिरक नहीं है। जहाँ जाओ हाथ बटानाँ पड़ता है। बैठ कर रोटी देने वाला कोई नहीं है। बस कुछ दिन रह कर माहौल बदल जाता है।
जब तक मई जून का महीना निकलेगा तब तक मन मे मलाल रहेगा। कुछ दिनो की महोलत नही मिलती कही गैर जगह या अन्जान लोगो मे घूमने कंहा जा रही थी। बस अपनी यादों को ताजा कर आती हूं । हस बोल आती हूँ । बापस तो घूम फिरकर ससुराल ही आना था।
फिर भी हाउस वाइफ की कदर नहीं है। उसके बिना देख रेख के घर अस्त व्यस्त हो जाता है। फिर से इंतजार करूंगी खुल कर सांस लेने का खिलखिला ने