कविता
प्रकृति
प्रकृति की देन को जान लो पहचान लो जल है तो जीवन है पानी है तो कहानी है । नहीं तो जीवन की अधूरी कहानी है
हरियाली है तो जीवन है भूख मिटे ये खास है कीमत जानो अनाजो की इसे फेको न कूडेदान मे
हवा है तो सांसे है सांस नहीं तो जीवन कैसा पेडो से गिरे सूखे पत्ते जैसा
आसमान मे सूरज चाँद सितारे है इन्हें खुले आसमान को सांसो मे समेट लो न बन्द रहो फ्लैटो मे कीमत जानो इन की न डॉक्टर के जाने पड़ेगा सारे विटामिन मिल जायेगे सारे गृह नक्षत्र सही हो जायेगे
धरती को धरती माँ रहने दो न रोदों इसे सीमेन्ट वदरपूर से पुल पे पूल बनाओगी देश की आबादी कब कम कराओगे
पहचानो अपनी धरोहर को खोलो अपनी आँखों को आज नही तो कल नही कब जान पाओगे बाण आयी धरती फटी बादले फटे पहाड गिरे बिजली गिरी भूंकप आया रोकथाम की कोई चीज नही पेड तुम नो काट दिये कुंए . तालाब पोखर, बंद किये मिट्टी पर बिल्डिंग बनायी पानी आशुद्ध किया बादल को धुंधला किया।
फिर भी चाँद सूरज है समय तुम्हे बता रहे कहाँ गये तुम कुदरत की बनायी इंसान चीज हो पशु पक्षी जानवर जीव जंतु प्राणी को सब को तुमने नौचा है
टैक लॉजी डाटा ' इंटरनेट के जमाने ने खुद ही खुद को नौचा है।
नन्दिनी अग्रवाल
उत्तर प्रदेश सम्भल