परिवार
जिन्दगी की गाड़ी अपनी चाल चल रही थी।
सब कुछ रोजमर्या कभी सोचा न था ऐसा हो जायेगा ' ।
मुसिबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा । जब मेरी मम्मी जी (सास) को बस बुखार आया और वह बुखार कब हवा की तरह उड़ कर कब वेटिलेटर ऑक्सीजन मशीनो मे ले गया।
जीवन इस पार या उस पार चल रहा था। सारे रिश्ते - तिररे - विररे हो गये । मोबाइल की घंटी घर हॉस्पीटल के चक्कर मे बदल गया। वही घर मुझे सुनसान लगने लगा। सभी चीजे बेजान लगने लगी। मैं घर मे अकेले बच्चो को लेकर पड़ी रहती ।पति अपनी माँ के पास 'हर पल दिल बैठता जा रहा था। जीवन मे हमारे संगे सम्बन्धी कितने जरूरी है। बैंक बैलेश घटता जा रहा था। घर के सदस्य को बचाना था। हर कीमत पर जब मन ये ख्याल आ रहा था। हम कितने लापरवाहा होते है। अपने कीमती जीवन के लिय सोचते नहीं है। स्वास्थ बीमा / जीवन बीमा करा लिया होता पैसा धीरे-धीरे एक कोने मे इकट्ठा होता रहता । आँखो के आँसू रुक नही रहे थे। ख्यालो की बरसात मन में बाढ सी सा गयी / सब कुछ पहले जैसा ठीक हो जाये। हमारे परिवार मे बड़े बुजुर्ग एक ढाल की तरह है। उन्ही से घर में चहल पहल रहती है। बार -बार ससुर (पापाजी , ) ' सहारना देना। दिलाशा देकर रखा जा रहा था। सब अच्छा होगा। आखिर वह पल आ गया / जब सासुमाँ घर सही सलामत आ गयी। अफसोस उन -का पैर का थोड़ हिस्सा कांटना पड़ा जो जान बचाने के लिए जरूरी था। सभी घर मे खुश थे। हमारे घर मे फिर से खुशियां आ गयी। हमे समय रहते रिश्तो की कदर करनी चाहिए। दुनिया से चले जाने के बाद फिर दोबारा नही मिलते न व्यक्ति न जीवन
नन्दिनी अग्रवाल