हाँ, मैं आधुनिक स्त्री हूँ…
मुझे दफ़्तर अकेले जाने से डर नहीं लगता।
दफ़्तर से देर रात अकेले घर आने से भी नहीं डरती।
नहीं डरती मैं अंधेरी रात में एक घर में अकेले होने से।
नहीं डरती मैं सुनसान जगह अकेले पुरुषों के साथ काम करने से।
भीड़ में अकेले चलने से भी नहीं डरती मैं।
ना ही डरती हूँ सड़क के किनारे रुक कर अकेले कुछ खाने से।
पर बहुत डरती हूँ मैं परिवार की राजनीति से।
उन लोगों से भी
जो अपने होने का दावा करके
पीठ पीछे खंजर घोंपते हैं।
बहुत डरती हूँ उन आँखों से
जो मुस्कुराहट ओढ़े रहती हैं,
पर भीतर ईर्ष्या का अंधेरा छुपाए होती हैं।
डर लगता है उन रिश्तों से
जहाँ अपनापन शब्दों में होता है,
और हिसाब दिलों में।
फिर भी…
मैं हर सुबह खुद को समेटती हूँ,
अपने आँसू आँखों में ही सिलती हूँ,
और मुस्कुरा कर निकल पड़ती हूँ
क्योंकि मैं जानती हूँ,
मेरी लड़ाई दुनिया से कम,
नक़ाब पहने चेहरों से ज़्यादा है।
हाँ, मैं आधुनिक स्त्री हूँ…
बाहर के अंधेरों से नहीं हारती,
बस अपनों के भीतर बसे अंधेरों से
हर रोज़ थोड़ा लड़ती हूँ…
और फिर भी,
हर रोज़ खुद को बचा लेती हूँ।