कल थी
आज नहीं हो,
आकाश है,धरती है
तुम मन में हो
पर इन में नहीं हो।
कल घर पर थी
आज नहीं हो,
रसोई से आने वाली सुगन्ध
घर में नहीं
मन में है।
काँटे इधर भी हैं
उधर भी हैं,
तुम फूल सी
मन में खिली हुयी हो।
साथ कल था
आज नहीं है,
तुम राह में नहीं
मन में हो।
कल मन्दिर में थी
आज नहीं हो,
ईश्वर के अन्दर
सन्नाटा है।
सूर्य को अर्घ्य देती
कल तुम थी
आज नहीं।
आज सूर्य बिना अर्घ्य के
उगा और डूब गया।
*** महेश रौतेला