वह धूप की पहली किरण जैसी, अंधेरों को भगाती है,
एक नन्हीं सी जान, जो पूरे घर को नचाती है।
कभी घुटनों के बल चलकर, वह फर्श को सजाती है,
कभी तोतली बातों से, सबको हंसना सिखाती है।
वह पिता की लाडली है, माँ की वह हमराज है,
वह आने वाले कल का, एक खूबसूरत आगाज है।
रसोई में माँ के पीछे, उसका साया बनकर चलना,
पिता के दफ्तर से आने पर, पानी लेकर निकलना।
वह सयानी हो जाती है, पर दिल से बच्चा रहती है,
बिना कहे भी वह घर की, हर एक पीड़ा सहती है।
उसके होने से ही घर में, तीज-त्योहार सजते हैं,
वरना दीवारों के साये भी, अक्सर वीरान लगते हैं।
कभी सरस्वती का रूप है वह, कभी लक्ष्मी सी लगती है,
अपनी त्याग और ममता से, वह दुनिया को बदलती है।
बेटे तो बस एक घर के, चिराग कहे जाते हैं,
पर बेटियाँ तो दो घरों की, लाज बन जाती हैं।
उड़ जाने दो उसे भी, खुले आसमानों में आज,
उसके भी तो पंख हैं, उसका भी तो है राज।
वह बोझ नहीं, वह तो घर की सबसे बड़ी शक्ति है,
सच कहूँ तो बेटी ही, ईश्वर की सच्ची भक्ति है।