हवा के झोंके जैसी है वो, सबको छूकर जाती है,
रूठ जाए अगर कोई, तो पल में उसे मनाती है।
घर की हर एक चीज़ को, वो सलीके से सजाती है,
खुद भूखी रह लेगी, पर सबको प्रेम से खिलाती है।
वो जो कभी छोटी सी उंगली पकड़कर चली थी,
आज वक़्त की धूप में, वो एक छाँव बन गई है।
दबे पाँव आती है वो, जब पिता थक कर लौटते हैं,
माथे की सारी शिकन, उसकी मुस्कान से मिट जाती है।
कच्चे धागों का वो बंधन, जो कभी टूटता नहीं,
वो रूह का वो रिश्ता है, जो कभी छूटता नहीं।
बेटा मांगता है हक, शायद वो हिसाब करता है,
पर बेटी तो हर दुआ में, बस सबका भला ही मांगती है।
वो आँगन की तुलसी है, वो मंदिर की आरती है,
अपनी बातों से वो, घर की उदासी मारती है।
कितने भी गम हों दिल में, वो मुस्कुराकर मिलती है,
जैसे तपती दुपहरी में, कोई ठंडी हवा चलती है।
खुशकिस्मत हैं वो हाथ, जिनमें बेटी की लकीर है,
वो सिर्फ एक संतान नहीं, वो घर की तकदीर है।
उसे बचाना, उसे पढ़ाना और उसे उड़ना सिखाना,
क्योंकि इस दुनिया की सबसे खूबसूरत, वो ही तस्वीर है।