सिर्फ आँगन की रौनक नहीं, आसमान का सितारा है,
हर डूबती हुई कश्ती का, बेटी ही सहारा है।
वो कोमल है पर कमज़ोर नहीं, ये बात ज़माने को बतानी है,
हर मुश्किल से जो लड़ जाए, वो ऐसी झाँसी की रानी है।
कभी कलम बनकर वो, नया इतिहास लिखती है,
कभी सरहद पर खड़े होकर, वो ढाल सी दिखती है।
अब वो ज़माना गया जब उसे, चारदीवारी में रखते थे,
अब तो अंतरिक्ष की ऊँचाइयों पर, उसके कदम चमकते हैं।
वो घर की मान-मर्यादा भी है, और स्वाभिमान भी,
उसकी आँखों में बसता है, अपना एक जहान भी।
वो भाई की कलाई का धागा, पिता का ऊँचा सर है,
जहाँ बेटी का सम्मान नहीं, वो मिट्टी का बस घर है।
धैर्य की वो मूरत है, ममता की वो बहती धारा है,
ईश्वर ने बड़े चाव से, उसके व्यक्तित्व को संवारा है।
उसे पराया धन मत समझो, वो तो घर की पूँजी है,
हर ताले को जो खोल दे, वो खुशियों की ऐसी कूँजी है।
उम्मीद है ये कविता भी आपको पसंद आएगी।