कभी-कभी हम अपनी ही तस्वीर को गौर से देखते हैं और समझ नहीं आता कि वो मुस्कुराहट असली है या बस कैमरे के लिए पहनी हुई एक नकाब।
अजीब बात है न, आज हमारे पास सैकड़ों 'दोस्त' हैं स्क्रीन पर, पर दिल की बात कहने के लिए एक कंधा तक नसीब नहीं होता।
हम दिखावे के उस ऊँचे पहाड़ पर चढ़ तो गए हैं, जहाँ से सादगी अब बहुत छोटी नज़र आती है। इन्हीं जज्बातों को कुछ पंक्तियों में उतारा है।
महँगे लिबासों में अक्सर खालीपन ही झलकता है,
कि अब सादगी को लोग गरीबी का नाम देते हैं।
भीड़ में खड़े होकर भी खुद को अकेला ही पाया हमने,
यहाँ हर शख्स हाथ तो मिलाता है, पर दिल से नहीं मिलता।
कमाल का हुनर है इस जमाने के लोगों में 'इरफ़ान',
यहाँ चेहरे पर चेहरा लगाकर लोग वफादारी का जाम पीते हैं।
तो दोस्तों, क्यों न एक दिन बिना किसी 'फिल्टर' के जी कर देखें? क्यों न उस इंसान से मिलें जो आइने के पीछे कहीं गुम हो गया है? ये दुनिया सिर्फ उन्हीं को याद रखती है जिनकी सादगी में सच्चाई होती है, चमक-धमक तो वक्त के साथ फीकी पड़ ही जाती है।
खुद से जुड़िए, क्योंकि सबसे लम्बा सफर वही है जो आप खुद की तलाश में तय करते हैं। सोचिएगा ज़रूर, कि आप जो दिख रहे हैं, क्या वाकई वही हैं?"
— आपका दोस्त, इरफ़ान खान