*॥ नेता जी का 'त्याग' ॥*
कोई वादा समझता है, कोई जुमला समझता है,
मगर जनता की बेबसी, बस गमला समझता है।
वो पाँचों साल दिल्ली में, मजे की नींद लेते हैं,
वोट का वक्त आते ही, इसे 'हमला' समझता है॥
कभी वो हाथ जोड़ेंगे, कभी चरणों में गिरते हैं,
गली की खाक छानेंगे, फकीरों जैसे फिरते हैं।
जो कल तक पूछते ना थे, 'किधर है घर तुम्हारा भाई?'
वो अब झोली में अपनी, सारा ब्रह्मांड भरते हैं॥
विपक्ष में जो बैठे थे, वो अब सरकार में आए,
जो कपड़े उजले पहने थे, वो अब कीचड़ में नहाए।
सिद्धांतों की बातें बस, किताबों में ही अच्छी हैं,
हकीकत में तो गधे भी, अब घोड़ों संग दौड़ाए॥
चुनावों के समंदर में, ये वादों की जो नैया है,
कभी 'दीदी' खिवैया है, कभी 'भैया' खिवैया है।
मगर इस खेल में आख़िर, मरेगा आम आदमी ही,
क्योंकि नेता जी का असली, बस 'विटामिन-रुपैया' है॥
*Adv. आशीष जैन*
*7055301422*
*फिरोजाबाद*